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एक माँ ऐसी भी...

जो कभी माँ होने के एहसास को महसूस नहीं कर पाई...

मां शब्द में पूरी दुनिया समाई है। ये एक ऐसा रिश्ता है जिसमे रिश्ते से जिंदगी है। ये एक ऐसा रिश्ता है जिस रिश्ते से जिंदगी का जन्म होता है और सांसे भी यही आकर थम जाती है। माँ तो हर धर्म में माँ ही होती है।

माँ की ममता हर बच्चों के लिए एक जैसी होती है। अपने बच्चों के लिए देखे गए माँ के सपने भी कहीं न कहीं एक जैसे ही होते हैं। फर्क बस हालात का होता है। जिन हालातों में एक माँ अपने बच्चे की परवरिश करती है।

एक माँ ऐसी भी होती है,जो मां होने के एहसास को कभी महसूस नहीं कर पाती है। एक माँ ऐसी भी जिसे हमेशा माँ के हक से वंचित रखा गया। हमने हमेशा देखा है कि बच्चों के जीवन पर एक माँ का सबसे ज्यादा अधिकार होता है। माँ के सपने अपने बच्चे के ही इर्द गिर्द घूमते हैं। जैसे जैसे बच्चें बड़े होते हैं माँ की उम्मीदों का दामन भी बड़ा होता जाता है। वो सोचती हैं कि जो चीजें वो बचपन में नहीं कर पाई वो सब उनके बच्चे करें। जिस ममता के दामन से वो अछूती रहीं उस प्यार भरे आंचल को वो अपने बच्चों को उढ़ा सकें। लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर माँ का भाग्य एक जैसा ही हो। कुछ माँए माँ ही नहीं बन पाती है, अब वजह चाहे जो भी हो लेकिन उनके दर्द को कोई नहीं समझ पाता है। सब बस उसे ना जाने क्या क्या कह जाते हैं। शब्दों के घाव उसकी दामन छील जाते हैं। शायद ये कोई नहीं जानता कि वो माँ बनने के लिए क्या कुछ नहीं करती है। ऐसा कोई चौखट नहीं होता जाहाँ वो गिड़गिडा़ती नहीं, मिन्नते नहीं करती। हर डाॅक्टर हर हकीम को अपनी नसे दिखा आती है।

कहते हैं कि माँए भाग्य का लेखा पलट देती है लेकिन एक माँ ऐसी भी होती है जो अपना भाग्य नहीं बदल पाती है। कुछ लोगों को लगता है उनकी ज़िंदगी में कुछ कमी है। कमी इसलिए क्योंकि उनके बच्चे नहीं हैं। माँ बने बिना औरत अधूरी?

'कुछ-कुछ होता है' फ़िल्म में रानी मुखर्जी कहती हैं-औरत जब तक माँ न बने, उसका औरत होना पूरा ही नहीं होता..! बेशक़ माँ की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन उन तमाम औरतों का क्या जो माँ बनना तो चाहतीं लेकिन बन नहीं पाती हैं आज हम उन माँओ को भी नमन करते हैं
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